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प्रकृति बचाना हमारी संस्कृति और संस्कारों का हिस्सा

देहरादून। भारतीय वन्य जीव संस्थान के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं द कॉर्बेट फाउंडेशन के सलाहकार प्रो. कमर कुरैशी ने कहा कि प्रकृति हमारी संस्कृति और जीवन का अभिन्न हिस्सा है। भारत में सदियों से प्रकृति और वन्य जीवों के संरक्षण को हमारी परंपराओं और जीवन मूल्यों में विशेष स्थान मिला है। प्रो कुरैशी आज ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी में वाइल्डलाइफ वीक के अंतर्गत विशेष सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।

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उन्होंने कहा कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन जरूरी है। बाघ संरक्षण के साथ उसके प्राकृतिक आवास और अन्य प्रजातियों को बचाना भी जरूरी है। उन्होंने मानवीय दबाव और अवैध वन्यजीव व्यापार को बड़ी चुनौती बताते हुए इनसे निपटने में समाज की भागीदारी पर जोर दिया। कुलपति डॉ. नरपिंदर सिंह ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, ड्रोन, कैमरा ट्रैप और पर्यावरणीय डीएनए जैसी तकनीकें वन्यजीव संरक्षण और शोध को नई दिशा दे रही हैं।

इन तकनीकों से वन्यजीवों की निगरानी और संघर्ष की पहचान समय रहते संभव है। भारतीय वन्य जीव संस्थान की वैज्ञानिक-ई, डॉ विष्णुप्रिया कोलिपकम ने कहा कि भारत गंभीर जल तनाव का सामना कर रहा है, जिसका असर नदी पारिस्थितिकी तंत्र और वन्यजीवों पर भी पड़ रहा है। कार्यक्रम का आयोजन यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ बायो साइंसेस, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और एम्बर फाउंडेशन ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम में प्रो-वीसी डॉ. संतोष एस. सर्राफ, कुलसचिव डॉ. नरेश कुमार शर्मा, बायोसाइंसेस विभाग की हेड डॉ. मनु पंत, प्रो. वी. पी. उनियाल, अन्य शिक्षक-शिक्षिकाएं और छात्र-छात्राएं शामिल रहे।

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