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‘भारत टैक्सी’ में सारथियों की अब तक की सारी चिंताओं का समाधान होगा

नई दिल्ली। नई दिल्ली की उस दोपहर में एक अलग तरह की ऊर्जा थी। देश के कोने-कोने से आए टैक्सी चालकों के बीच एक विचार आकार ले रहा था – श्रम करने वाला ही मुनाफे का असली हकदार हो। यह कोई साधारण बैठक नहीं थी – यह सोच के बदलाव की शुरुआत थी। सहकारिता के असल योद्धा अमित शाह के विज़न के केंद्र में एक सीधा प्रश्न था – सड़क पर दिन-रात मेहनत करने वाला व्यक्ति आखिर केवल कमिशन पर क्यों जिए? क्यों न वही मालिक बने? और यहीं से कहानी शुरू होती है ‘ड्राइवर’ से ‘सारथी’ बनने की।
शाह ने जिस सोच को सामने रखा, उसमें ‘ड्राइवर’ शब्द की जगह ‘सारथी’ को प्रतिष्ठा देने का संकल्प था। यह केवल शब्द परिवर्तन नहीं, बल्कि सम्मान, स्वाभिमान और साझेदारी की नई परिभाषा गढ़ने का प्रयास था। सड़क पर पसीना बहाने वाला व्यक्ति केवल सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि व्यवस्था का भागीदार और स्वाभिमान से भरा मालिक हो – यही इस पहल का मूल भाव है।

अंत्योदय की राजनीति करने वाले अमित शाह की परिकल्पना में ‘भारत टैक्सी’ किसी निजी कंपनी की तरह अधिकतम लाभ कमाने की दौड़ में शामिल नहीं है। इसके केंद्र में वह व्यक्ति है जो रोज सड़कों पर पसीना बहाता है। ‘भारत टैक्सी’ की संरचना इस तरह गढ़ी गई है कि 500 रुपये का शेयर लेकर कोई भी सारथी मालिकाना हक का भागीदार बन सके। आने वाले तीन वर्षों में इसे देश के हर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन तक पहुंचाने की रूपरेखा इस बात का संकेत है कि यह केवल एक सेवा नहीं, बल्कि सहकारिता के राष्ट्रीय आंदोलन का विस्तार है – जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सशक्त हुआ है। देश के हर अंतिम व्यक्ति को सशक्त बनाने वाले अमित शाह की सोच इस मॉडल के राजस्व ढांचे में भी दिखाई देती है। कहानी का अगला अध्याय और भी दिलचस्प है। कमाई का 80 प्रतिशत सीधे सारथियों के खाते में – जितना चले, उतना कमाए। शेष 20 प्रतिशत भविष्य की पूँजी, ताकि व्यवस्था टिकाऊ बने।

शुरुआती तीन वर्षों में विस्तार पर ध्यान और उसके बाद लाभ का समान वितरण – यह संरचना बताती है कि लक्ष्य बाजार पर कब्जा नहीं, बल्कि स्थायी सहकारिता तंत्र खड़ा करना है। सहकारिता आंदोलन के रणनीतिक शिल्पी अमित शाह ने संरचना को इस प्रकार गढ़ा है कि बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में सारथियों के लिए आरक्षित स्थान हों। जब नीति निर्माण की मेज पर वही लोग बैठेंगे जो प्रतिदिन यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाते हैं, तब निर्णय भी ज़मीनी अनुभवों से प्रेरित होंगे। महिला सशक्तिकरण के संवाहक अमित शाह के मार्गदर्शन में ‘सारथी दीदी’ फीचर के माध्यम से महिला सारथियों को स्वावलंबन और महिला यात्रियों को सुरक्षा देने की परिकल्पना की गई है। ऐप में ऐसा प्रावधान होगा कि अकेली महिला यात्री स्वाभाविक रूप से महिला सारथी को प्राथमिकता दे सके। श्रम के सम्मान के संरक्षक शाह की इस पहल का सबसे बड़ा संदेश मानसिकता परिवर्तन है। ‘ड्राइवर’ नहीं, ‘सारथी’ – यह संबोधन स्वयं में सामाजिक गरिमा का प्रतीक बन सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सहकारिता को मिले नए आयाम और अमित शाह की रणनीतिक दृष्टि ने मिलकर इसे एक राष्ट्रीय मॉडल का स्वरूप दिया है। सड़कों पर दौड़ती हर टैक्सी अब साझेदारी, सम्मान और स्वाभिमान की चलती-फिरती मिसाल बन सकती है – जहाँ मुनाफा किसी एक कंपनी का नहीं, बल्कि उस सारथी का होगा जो स्टीयरिंग थामे हुए है।

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