आज है फूलदेई, जानिए क्यों है खास और क्यों मनाया जाता है ये त्यौहार

प्रकृति की गोद में पलने और बढ़ने वाले पहाड़ियों का पर्व फूलदेई है। प्रकृति के हर रंग में पहाड़ियों का जीवन बस्ता है। का त्योहार उत्तराखंड की लोक संस्कृति की एक झलक है।
यूट्यूब प्रखंड में हर मौसम का स्वागत एक त्यौहार की तरह किया जाता है, ठीक इसी तरह बसंत ऋतु की शुरुआत फूलदेई के साथ की जाती है। फूलदेई का त्यौहार उत्तराखंड वासियों की प्रकृति के प्रति प्रेम का उदाहरण है। कुमाऊं और गढ़वाल में बसंत ऋतु के स्वागत फूलदेई के साथ मनाया जाता है, जबकि जौनसार बावर में इस त्योहार को गोगा कहा जाता है। चैत के महीने की पहली तारीख को फूलदेई का त्यौहार मनाया जाता है।
इस दिन महिलाएं सुबह सवेरे घर की लिपाई पुताई और सफाई करती हैं। बच्चे नहा-धोकर फूल तोड़ने जाते हैं। इसके बाद बच्चे हर घर में फूल और चावल के दाने से हर घर की देहली का पूजन करते हैं। साथ में गीत भी गया जाता है।
फूलदेई,छम्मा देई
दैण द्वार भरी भकार
य देई कै बारम्बार नमस्कार
फूलदेई,छम्मा देई
हमर टुपर भरी जै
हमर देई में उनै रै
फूलदेई,छम्मा देई
गीतों का आशय है कि फूल देई तुम हम सबकी देहरियों पर हमेशा विराजमान बने रहो… और हमें खुसहाली प्रदान करते रहो…आपके आर्शीवाद से गांव इलाके में हम सभी के अन्न के कोठार हमेशा भरे रहें।
गांव के छोटे बच्चे सुबह फूलों को चुनकर लाते हैं, हर घर जाकर देहली का पूजन करते हैं और गीत के माध्यम से सबकी मंगल कामना करते हैं। इस त्यौहार मे कफ्फू, भिटोर, आडू-खुमानी आदि के फूलों से देहली की पूजी जाती है। हर घर से मिलने वाले चावल और गुड़ से महिलाएं मीठा पकवान बनाती हैं।
जिस प्रकार धीरे-धीरे उत्तराखंड में पलायन हो रहा है उसी प्रकार लोग त्योहार भी अपना अस्तित्व खो रहे हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया के जरिए जिस प्रकार फूलदेई के त्यौहार को प्रदर्शित किया है उसका नतीजा है कि पहाड़ों के साथ-साथ मैदानी इलाकों में भी पहाड़ी लोग फूलदेई मनाते हैं