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जागरूकता बुनी जिंदगी में: संजीवनी ने ‘पिंक टैग प्रोजेक्ट’ शुरु करके रोजमर्रा की पलों को जीवन रक्षक संदेश में बदली

देहरादून। फेडरल बैंक हॉरमिस मेमोरियल फाउंडेशन, (Federal Bank Hormis Memorial Foundation) न्यूज18 नेटवर्क और नॉलेज पार्टनर टाटा ट्रस्ट्स द्वारा शुरू की गई परिवर्तनकारी पहल “संजीवनी: यूनाइटेड अगेंस्ट कैंसर” के तीसरे संस्करण में “द पिंक टैग प्रोजेक्ट” लॉन्च किया गया है। यह एक अनोखी और असरदार व्यवहार परिवर्तन पहल है, जो महिलाओं तक उनके सबसे निजी और व्यक्तिगत पलों में पहुंचती है और उन्हें यह याद दिलाती है कि अपनी देखभाल कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा लिए जरूरी है। भारत में हर चार मिनट में एक महिला को स्तन कैंसर का निदान होता है। हर आठ मिनट में एक महिला इस बीमारी के कारण अपनी जान गंवा देती है। छोटे शहरों और गांवों में, जहां जानकारी की कमी है और सामाजिक झिझक ज्यादा है, वहां स्तन स्वास्थ्य पर बातचीत लगभग नहीं होती। महिलाएं शायद ही कभी अपने लिए समय निकाल पाती हैं।

घर के काम, रोजगार और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उनका खुद का स्वास्थ्य पीछे छूट जाता है। जब तक कोई गंभीर संकट सामने नहीं आता, तब तक उनकी सेहत अनदेखी, टाली हुई और भुला दी जाती है। पिंक टैग प्रोजेक्ट एक बहुत ही सरल लेकिन गहरे विचार से जन्मा है। एक महिला के दिन का सबसे निजी पल, जब वह कपडे पहनती है, वही पल उसकी सेहत को लेकर जागरूकता जगाने का सबसे ताकतवर समय बन सकता है। इसका समाधान बहुत आसान और समझने योग्य है। एक छोटा गुलाबी रंग का टैग, जिस पर स्तन की स्वयं जांच कैसे करें, इसकी साफ-साफ जानकारी लिखी होती है। इस टैग को ब्लाउज, कुर्ता या अंदर पहनने वाले कपडों के अंदर, कपडें धोने की सूचना देनेवाले टैग के पास सिल दिया जाता है। जहां महिला अकेली होती है और खुद पर ध्यान देती है, वहीं यह पिंक टैग उसे चुपचाप लेकिन साफ तरीके से याद दिलाता है।

यह कोई ऐसा अभियान नहीं है जो उसका समय मांगे या किसी सेमिनार में जाना पडें। यह तो रोजमर्रा के जीवन में कपडों के साथ बुना हुआ एक छोटा सा संदेश है। पिंक टैग प्रोजेक्ट की पूरी कहानी को एक प्रभावशाली शॉर्ट फिल्म में दिखाया गया है। इस फिल्म को मशहूर अभिनेत्री शीबा चड्ढा ने आवाज दी है। फिल्म की शुरुआत एक कडवी सच्चाई से होती है। भारत में हर चार मिनट में एक महिला को स्तन कैंसर होता है, फिर भी छोटे शहरों में सन्नाटा पसरा रहता है। फिल्म में महिलाओं को उनके रोज़ के काम करते हुए दिखाया गया है, जैसे पानी भरना, आंगन साफ करना, खाना बनाना और कपडे पहनना। फिर आता है वह खास पल। जब महिला ब्लाउज के हुक लगाती है, साडी की प्लीट ठीक करती है, कुर्ता पहनती है, तब उसकी नजर पिंक टैग पर पडती है। एक शांत लेकिन लगातार याद दिलाने वाला संकेत। महिलाएं उसे देखती हैं, पढती हैं और सवाल पूछती हैं।

स्थानीय स्वयंसेवक, जो प्रशिक्षित और भरोसेमंद होते हैं, उन्हें समझाते हैं। घरों में बातचीत शुरू होती है। बेटियां अपनी मां को दिखाती हैं। पोतियां अपनी दादियों को याद दिलाती हैं। जो चीज जिज्ञासा से शुरू होती है, वह बातचीत बनती है और फिर एक आंदोलन का रूप ले लेती है। इस पहल पर बात करते हुए फेडरल बैंक के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर एम. वी. एस. मूर्ति ने कहा, “फेडरल बैंक हॉरमिस मेमोरियल फाउंडेशन में हमारा मानना है कि असली बदलाव बडे और दिखावटी अभियानों से नहीं आता। बदलाव उन प्रयासों से आता है जो धीरे से, लगातार और संवेदनशीलता के साथ लोगों तक पहुंचते हैं। पिंक टैग प्रोजेक्ट व्यवहार आधारित डिजाइन की ताकत को दिखाता है। न्यूज18 स्टूडियोज के सीओओ सिद्धार्थ सैनी ने बताया कि, “नेटवर्क18 के लिए पहुंच महत्वपूर्ण है, लेकिन भागीदारी उससे भी ज्यादा जरूरी है।

हमारे सामाजिक प्रयास असली मानवीय समझ पर आधारित हैं। लोग कैसे जीते हैं, वे क्या देखते हैं और क्या उनके साथ रह जाता है। हडलर्स इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड के सह-संस्थापक और सीईओ सुरोजित सेन ने कहा, “संजीवनी पहल पर काम करते हुए हमें लोगों के व्यवहार को गहराई से समझने का मौका मिला, खासतौर पर कैंसर जांच के नजरिए से। किसी के पास जांच के लिए समय नहीं होता, खासकर महिलाओं के पास, जिन्हें अपने स्वास्थ्य के लिए भी मुश्किल से समय मिलता है। तभी हमें एक ऐसा पल मिला, जब महिला अकेली होती है और खुद पर ध्यान देती है, यानी कपडे पहनते समय।

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